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कौन बनता है भाग्य

आप स्वयं या भगवान संसार में बहुत ही कम ऐसे व्यक्ति होंगे जो भाग्य जैसे शब्दों को अपने जीवन में बहुत कम महत्व देते हैं। प्रायः सभी यही मानते हैं कि उनके भाग्य को लिख दिया गया है उसी अनुसार समयानुसार फल मिलते चले जायेंगे और भारत में तो हर व्यक्ति के जुबान पर यह कहावत है कि ''होई वो ही जो राम रचि राखा'' भाग्य के बारे ऐसे अनेकों जुमले हम हर मुँह से सुनते चले आ रहे हैं। कौन लिखता है हमारा भाग्य ? कौन है हमारा भाग्य विधाता किसको रूचि है इस संसार में हमारा भाग्य लिखने की ? आईये सदियों से प्रचलित इस रहस्य पर से पर्दा हटाते हैं और जानेंगे वो ठोस अटल सत्य जिससे हम बन सकते हैं स्वयं अपने भाग्य विधाता और मुक्त हो सकते हैं एक घातक अंधविश्वास से। आपका भाग्य लिखने में ईश्वर को कोई रूचि नहीं है - सभी लोग अधिाकतर यही सोच रखते हैं कि आसमान में एक भगवान नामक शरीर धारी व्यक्ति बैठा हुआ है और वह अपनी मर्जी अनुसार हरेक का भाग्य लिख-लिखकर संसार में भेजता रहता है और उसी के अनुसार मानव सुख-दुःख, अमीरी-गरीबी को भोग रहा होता है। तो पहले हमें ईश्वर के बारे में यह धारणा स्पष्ट कर लेनी चाहिये कि ईश्वर कोई व्यक्ति का स्वरूप नहीं है जो निर्णय लेता है। सारे संसार में फैले ऐश्वर्य को हम ईश्वर के नाम से पुकारते हैं। वह संपूर्ण सत्ता है जो कण-कण में व्याप्त है। इसी फैली हुई भगवत्ता को हम भगवान कहते हैं, इसी गॉडलीनेस को हम गॉड कहते हैं। आदमी अपनी भावनात्मक सुविधा के लिये इस सारी सत्ता को एक व्यक्ति के रूप में ईश्वर को देखता है। इसी कारण हर धाार्म में ईश्वर के बारे में अपनी अलग-अलग राय है, धारणायें हैं। ईश्वर कानून बनाकर सो गया - अगर हम जीवन या प्रकृति के रहस्यों को देखते हैं तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड विश्व एक निश्चित नियम के अंतर्गत चल रहा है। ऐसा लगता है जैसे सारा कम्प्यूटराईज्ड है और नियम भी ऐसे अटल अटूट कि कोई इसमें कुछ भी नहीं कर सकता, यहाँ तक कि ईश्वर भी। ईश्वर कानून बना कर हमेशा के लिये सो गया। उसका कानून धरती की तरह है। मैंनें उसे कविता में यूँ लिखा है

धरती को क्या बीज से नाता । जैसा बीज को बोया जाता ॥
उसी स्वभाव, गुण, धर्म को लेकर । कड़वा, मीठा फल बन जाता ॥
कुदरत का कानून है धरती । कर्म तुम्हारे बीज ॥
एक बीज के फल हजार है । हजार फलों के लाखो बीज ॥
कहे नंद नहीं कोई जगत में । नरक, स्वर्ग को देने वाला ॥
नरक, स्वर्ग हम स्वयं रचते । पल-पल जैसा बीज को डाला ॥
आहार, व्यवहार, विचार से । हर पल बीज जो बोये ॥
पल-पल फल बनता गया । अचानक कुछ न होय ॥
कहे नंद जागे रहो । सचेत रहो हर पल ॥
इस पल बोया बीज ही । फल लायेगा कल ॥

आपके जीवन से ईश्वर को कोई मतलब नहीं। आप चाहें तो २४ घंटे सिर फोड़-फोड कर रोते रहें, चीखते रहें, चिल्लाते रहें तो ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड ता। आप चाहें तो हर पल हंसते गाते, नाचते रहें तो ईश्वर कहता है तेरी मर्जी। आप यहाँ फल खाकर ५०० साल जी लें तो आपकी मर्जी। आप यहाँ तंबाकू, कैंसर से मर जायें तो आपकी मर्जी। ईश्वर कहीं भी बीच में नहीं है ये आपका चुनाव है। इसलिये ईश्वर को दोष मत देना। तुम्हें यह निर्णय करना ही पड ेगा कि तुम कैसा जीवन जीना चाहते हो। तुम्हारा चुनाव करने में ईश्वर कहीं भी बीच में नहीं आता। तुम घर में फूल लगाकर बगीचा बनाओ तो तुम्हें कोई नही ंरोक रहा है, तुम उबड़-खाबड गंदा घर बनाके जीयो तो भी तुम्हें कोई नहीं रोक रहा है। तुम योग, व्यायाम, ध्यान करो तो तुम्हें कोई नहीं रोक रहा है और तुम वासनाओं और शराब में डूबे रहो तो तुम्हें कोई नहीं रोक रहा है। तुम सारी धरती को अफीम, गांजे, तंबाकू की खेतियों से भर दो तो ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड ता, तुम चाहो तो धरती को गुलाब और फलों से लाद दो तो ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड ता। चुनाव हम करते हैं ईश्वर नहीं, इसलिये ईश्वर को कभी बीच न लायें।

तो फिर कौन लिखता है हमारा भाग्य ? - हम लिखते हैं अपना भाग्य हर पल, हर क्षण हम करते हैं अपने जीवन का निर्माण ! कैसे ? जब हम पैदा होते हैं तो हम बिल्कुल एक शुद्ध पवित्र निर्मल आत्मा होते हैं फिर हम होश या बेहोशी में जो भी भावनात्मक या मानसिक क्रियायें-प्रतिक्रियायें करते हैं उसकी सकारात्मक या नकारात्मक तरंगें हमारी आत्मा के चारों ओर संस्कार निर्मित करती है। हम जब मर जाते हैं तो भौतिक शरीर हमारा नष्ट हो जाता है क्योंकि वह केवल एक वाहक था हमारे द्वारा पैदा की गई सूक्ष्म भावनात्मक एवं मानसिक तरंगें संस्कारों के रूप में आत्मा के साथ अगले जन्म में यात्रा करती है। उसी अनुसार हमारा स्वभाव, हमारी आदतें, हमारे आकर्षण-विकर्षण हम पहले ही अपने साथ ला चुके होते हैं। उसमें फिर हम अपने वर्तमान जीवन में, होश या बेहोशी में चुनाव कर घटा-बढ़ा रहे होते हैं। भाग्य का केवल इतना ही अर्थ है कि अब तक आपने जो कमाया हर पल सकारात्मक या नकारात्मक क्रिया-प्रतिक्रिया करके, होश में या बेहोशी में उसका प्रतिफल। आज आप वो ही हैं जो आपने कल बीज डाले थे, कल आप वो ही होंगे जो आज, अभी, इस पल आप निरंतर बीज डालेंगे। इस संसार में भविष्य है ही नहीं - भविष्य का अपना कोई अस्तित्व नहीं है वह तो वर्तमान का बेटा है, परछाई है, प्रतिफल है। वह ठीक आपके वर्तमान में डाले गये बीज के अनुसार अपना स्वरूप धारण कर रहा होता है। अगर आप पहले की तरह ही बेहोशी में अपना जीवन जीयें चले जा रहे होते हैं तो आपका भविष्य ठीक उसी अनुरूप बनता चला जायेगा। अगर आप जाग गये प्रकृति के नियमों को पहचान गये तो अब आप अपनी इच्छा शक्ति के अनुसार जैसा भविष्य चाहते हैं वैसा निर्मित कर सकते हैं क्योंकि अब हर पल का बीज आपके हाथ में है। आप होश में डाल रहे हैं इसलिये आप उसके विधाता हैं आप उसके लिये जिम्मेदार हैं। आप आनेवाले प्रतिफल को सहर्ष स्वीकार करेंगे। आपके पास फिर ''ऐसा क्यों'' शब्द नहीं होगा। मानव की खोज ईश्वर की नहीं, सत्य की है, प्रकृति के नियमों की है - जो भी संसार में बुद्ध, महावीर, कृष्ण हुये हैं इनमें से किसी ने भी ईश्वर की खोज नहीं की, सत्य की खोज की, प्रकृति के नियमों की खोज की और एक महाबोध के साथ बहते चले गये। इन नियमों के बहाव में अपनी मर्जी अनुसार। इसलिये सारे धर्म, सारे वेद शास्त्र, उपनिषदों का एक ही निचोड़ है कि जागो होश में आओ। प्रकृति के नियमों के साथ ढल जाओ इसी को बुद्धत्व कहा गया, इसी को मोक्ष कहा गया, निर्वाण कहा गया।

बेहोद्गा व्यक्ति का भाग्य उसके हाथ में नहीं होता-जागे हुये प्रबुद्ध व्यक्ति का भाग्य उसके ही हाथ में होता है वह जिस तरफ चाहे भाग्य की गाड़ी को मोड सकता है। जागा हुआ पुरूष अपनी गाड ी का खु द ड्राईवर होता है और बेहोश व्यक्ति बगैर ड्राईवर के, नाविक के, भाग्य के हाथों इधर-उधर बह रहा होता है क्योंकि वह बेहोशी में प्रकृति के विपरीत जी रहा होता है। इसलिये भाग्य बदलने का एक ही अचूक मार्ग है जागो होश में आओ, प्रकृति के नियमों को पहचानों, सत्य के साथ जुड जाओ। बेहोश का भाग्य निश्चित होता है, जागे हुये का भाग्य निश्चित नहीं होता क्योंकि वह आज का बीज बदलकर जैसा चाहे भविष्य का निर्माण कर सकता है।

भाग्य और इच्छा शक्ति - अब तक आपने जो कमाया वह भाग्य, आगे आप चाहें तो इच्छा शक्ति का उपयोग कर अपनी मर्जी अनुसार अपना भाग्य बदल सकते हैं। आपकी इच्छा शक्ति बनाती है आपका भाग्य हर पल। हम अपनी इच्छा शक्ति को तब कमजोर करते हैं जब हम ऐसी गलत धारणाओं को स्थाई रूप से अपने साथ जोड़ लेते हैं कि

  • भाग्य में होगा तो मिल ही जायेगा, नहीं तो नहीं मिलेगा।
  • भाग्य और समय से पहले कुछ भी नहीं मिलता।
  • होई वो ही जो राम रची राखा।

ये शब्द हम अपनी अज्ञानता के कारण इस्तेमाल करते हैं क्योंकि हमें प्रकृति के नियमों की जानकारी नहीं होती इसलिये हम परमात्मा और भाग्य पर सब छोड़ देते हैं या उन्हें जिम्मेवार मानते हैं। भारत की बर्बादी की जड़े - भाग्यवादिता - भारत के हर व्यक्ति के नस-नस में भाग्यवादिता कूट-कूट कर भरी हुई है इसके लिये बहुत बड़े जिम्मेदार हैं हमारे महात्मा, संत और ज्योतिष वर्ग। बहुत कम ऐसे महात्मा हुये जिन्होंने मानव को भाग्यवादिता से ऊपर उठने की प्रेरणा दी जैसे बुद्ध, महावीर, कृष्ण, नानक, ओशो इत्यादि।

जो जो महात्मा जिस-जिस स्तर पर प्रज्ञावान थे! उन्होंने उसी स्तर पर मानव का मार्ग दर्शन किया परंतु अफसोस जनक बात तो ये है कि भारत में ऐसे प्रबुद्ध महात्माओं का वर्ग १ प्रतिशत भी मुश्किल से रहा और ९९ प्रतिशत महात्माओं का वर्ग भाग्यवादिता को बढ़ावा देने वाला रहा। आज के भारत की स्थिति को देखकर, आज के प्रतिफल को देखकर क्या यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि हम लोग कहाँ पहुँचे हुये हैं ? हम किन शिक्षाओं के प्रतिफल है कि हम आज विश्व के संपन्न देशो में नहीं गिने जाते। दरिद्रता, गरीबी, भ्रष्टाचार, आडंबर, नकल, अंधविश्वास, गंदगी, अनुशासनहीनता, समय की बर्बादी, आलस्य, भाग्यवादिता में हम अव्वल हैं। ये भक्या ईश्वर ने ? जापान, अमेरिका, यूरोप पर ईश्वर की ज्यादा मेहरबानी है इसलिये सारे सर्वश्रेष्ठ रिसर्च, अध्ययन, आविष्कार, संपन्नता, प्रगति उन्हें दे दी और भारत के साथ पक्षपात कर दिया। जो देश ईश्वर को इतना ज्यादा मानता है वह इन सबसे इतना पिछड़ा हुआ है कि हम आज रोटी कपड़े और मकान से ऊपर सोच ही नहीं पाते हैं। अच्छी समृद्धि से हम कोषो दूर हैं। भारत में कुछ ही लोगों ने इस भाग्यवादिता की जंजीरों को तोड कर अपनी इच्छानुसार अपने व्यवसाय एवं जीवन को ढाला है बाकी सब जकडे बैठे हैं, भाग्य की जंजीरों में और उसको खूब मजबूत किये जा रहे हमारे महात्मा, हमारे ज्योतिष, हमारे समाचार टी.वी. चैनल जिस पर ज्योतिषियों की भरमार है। क्या ग्रह निश्चित करते हैं हमारा भाग्य- इस संसार में हरेक वस्तु चाहे वह ग्रह हो, पेड़-पौधे हो, मानव हो, खनिज तत्व हो। सब अपनी-अपनी तरंगों से एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। हम निश्चय रूप से केवल नवग्रहों से ही नहीं संपूर्ण तारामंडल से प्रभावित होते हैं नवग्रह तो ब्रह्मांड का २ प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। तो क्या ये सब हमारे भाग्य को प्रभावित करते हैं, निर्मित करते है ? जी नहीं ! ये आपका भाग्य का निर्माण नहीं करते ? ये तो अपने स्वभाविक रूप से अपनी धुरी पर घूम रह े वातावरण में एक सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जाओं का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। जब हमारी अपनी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, आत्मिक ऊर्जाऐं प्रबल होती हैं तो फिर हमें बाहरी कोई भी तरंगें प्रभावित नहीं करती चाहे वह ग्रहों की हो, टी.वी. कम्प्यूटर की हो, काले जादू की हो या मौसम की हो। ये सब अपनी जगह पर आ रही, जा रही होती है। कम ज्यादा होती रहती है। आप उस दिन से प्रभावित होने लग जाते हैं जब आप अपनी उपरोक्त आंतरिक शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आत्मिक ऊर्जाओं को नकारात्मक करते हैं या कमजोर करते हैं, अपने ग लत आहार, विचार एवं जीवन पद्धति से, तब तो फिर एक फूंक भी आपको गिरा सकतीवातावरण में एक सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जाओं का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। जब हमारी अपनी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, आत्मिक ऊर्जाऐं प्रबल होती हैं तो फिर हमें बाहरी कोई भी तरंगें प्रभावित नहीं करती चाहे वह ग्रहों की हो, टी.वी. कम्प्यूटर की हो, काले जादू की हो या मौसम की हो। ये सब अपनी जगह पर आ रही, जा रही होती है। कम ज्यादा होती रहती है। आप उस दिन से प्रभावित होने लग जाते हैं जब आप अपनी उपरोक्त आंतरिक शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आत्मिक ऊर्जाओं को नकारात्मक करते हैं या कमजोर करते हैं, अपने ग लत आहार, विचार एवं जीवन पद्धति से, तब तो फिर एक फूंक भी आपको गिरा सकती है।वातावरण में एक सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जाओं का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। जब हमारी अपनी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, आत्मिक ऊर्जाऐं प्रबल होती हैं तो फिर हमें बाहरी कोई भी तरंगें प्रभावित नहीं करती चाहे वह ग्रहों की हो, टी.वी. कम्प्यूटर की हो, काले जादू की हो या मौसम की हो। ये सब अपनी जगह पर आ रही, जा रही होती है। कम ज्यादा होती रहती है। आप उस दिन से प्रभावित होने लग जाते हैं जब आप अपनी उपरोक्त आंतरिक शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आत्मिक ऊर्जाओं को नकारात्मक करते हैं या कमजोर करते हैं, अपने ग लत आहार, विचार एवं जीवन पद्धति से, तब तो फिर एक फूंक भी आपको गिरा सकती है। है वातावरण में एक सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जाओं का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। जब हमारी अपनी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, आत्मिक ऊर्जाऐं प्रबल होती हैं तो फिर हमें बाहरी कोई भी तरंगें प्रभावित नहीं करती चाहे वह ग्रहों की हो, टी.वी. कम्प्यूटर की हो, काले जादू की हो या मौसम की हो। ये सब अपनी जगह पर आ रही, जा रही होती है। कम ज्यादा होती रहती है। आप उस दिन से प्रभावित होने लग जाते हैं जब आप अपनी उपरोक्त आंतरिक शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आत्मिक ऊर्जाओं को नकारात्मक करते हैं या कमजोर करते हैं, अपने ग लत आहार, विचार एवं जीवन पद्धति से, तब तो फिर एक फूंक भी आपको गिरा सकती है। वातावरण में एक सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जाओं का उतार-चढ़ाव चलता रहता है। जब हमारी अपनी शारीरिक, मानसिक भावनात्मक, आत्मिक ऊर्जाऐं प्रबल होती हैं तो फिर हमें बाहरी कोई भी तरंगें प्रभावित नहीं करती चाहे वह ग्रहों की हो, टी.वी. कम्प्यूटर की हो, काले जादू की हो या मौसम की हो। ये सब अपनी जगह पर आ रही, जा रही होती है। कम ज्यादा होती रहती है। आप उस दिन से प्रभावित होने लग जाते हैं जब आप अपनी उपरोक्त आंतरिक शारीरिक, मानसिक, भावात्मक, आत्मिक ऊर्जाओं को नकारात्मक करते हैं या कमजोर करते हैं, अपने ग लत आहार, विचार एवं जीवन पद्धति से, तब तो फिर एक फूंक भी आपको गिरा सकती हे

इसे उदाहरण से समझे - हिमालय की गोद में एक हुंजा आदिवासी प्रजाति है वहाँ १००-१२५ साल तक जीना साधारण बात है क्योंकि वहाँ जीवन प्राकृतिक और मेहनती है। आधुनिक खान-पान पहुँचा नहीं है। तो क्या ईश्वर या भाग्य इन पर ज्यादा मेहरबान है और शहर वालों पर कम मेहरबान है जहाँतनाव, खान-पान एवं जीवन पद्धति से आदमी ५०-६० साल में रोगग्रस्त होकर मर जाता है। हमारी मौत, बीमारियाँ, संबंध, अच्छी-बुरी घटनाओं का आगमन, समृद्धि गरीबी, हमारे सुख-दुःख, हमारी धारणाओं, मान्यताओं, विचारों, मानसिक खुलापन या अवरोध, हमारे ज्ञान-अज्ञानता पर निर्भर है। आपका पूर्वजन्म निर्धारित करता है आपका वर्तमान भाग्य - आज का भाग्य कल के जीवन की देन है। आपने अपने पूर्वजन्म में जो भी सकारात्मक, नकारात्मक, जीवन, विचार, संबंध, कर्म क्रियायें प्रतिक्रियायें की है उसी का ठीक प्रतिफल है। आप अपनी पूर्व अर्जित तरंगों के अनुसार मां-बाप, रिश्तेदार, मित्रता, गलतपरिस्थितियों को अपने जीवन में आकर्षित करते हैं। इसका चुनाव ईश्वर नहीं करता, इच्छाशक्ति इसमें बदलाव लाती है। ग्रहों के प्रभाव वातावरण और मौसम को हल्का या भारी करते हैं कभी सकारात्मक-किरणों का प्रभाव बढ़ जाता है तो कभी नकारात्मक किरणों का प्रभाव। अगर आपकी शारीरिक-मानसिक क्षमतायें आपनें गलत धारणाओं और आहार-विहार से कमजोर कर दी है तो आप निश्चय ही इससे प्रभावित होते हैं। मानसिक क्षमताओं में (नकारात्मक ऊर्जाओं का प्रतिरोध न कर पाने के कारण) कमी आने लगती है। जिससे हम गलत निर्णय लेने लगते है। वैचारिक शक्ति कमजोर हो जाती है। भय ग्रस्त हो जाते हैं। दूसरों के विचार एवं सुझावों से ज्यादा प्रभावित होने लगते हैं। बस यहाँ से शुरू होती है आपकीभाग्यवादिता। आप अपनी जीवन पद्धति, गलत धारणाओं को जिम्मेदार मानने के बजाय, इनको सुधारकर सकारात्मक मज़बूत बनाने के बजाय, आप शनि-मंगल जैसे ग्रहों को दोष देने लग जाते हैं और ज्योतिष गणना के अनुसार उस समय किसी न किसी ग्रह के कम ज्यादा प्रभाव वातावरण में पड ही रहे होते हैं। क्या ग्रहों के प्रभाव से बच सकते हैं ? - हम सभी जानते हैं कि जब हम कमजोर होते हैं तो गर्मी, सर्दी, बरसात, कोलाहल हल्की आवाजें भी हमसे सहन नहीं होती। जब हम मज बूत होते हैं तो गर्मी-सर्दी को भी लंबे समय तक झेल लेते हैं। अगर आप प्राकृतिक आहार-विहार, योग-ध्यान, रेकी, तनाव रहित जीवन से या सकारात्मक धारणाओं से अपने आपको सशक्त रखते हैं तो ग्रहों के कोई भी प्रभाव आपको विचलित नहीं करते आपको पता भी नहीं चलता कि कौन-सा ग्रह कब आया और कब गया, कौन सा मौसम कब आया कब गया, क्योंकि आपके अपने शरीर मन में कोई परिवर्तन नहीं आता।

आप मौसम की मार, ग्रहों के प्रभाव से सचमुच बच सकते हैं जैसे ही आप अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा अपनी जीवन पद्धति एवं विचारों को सकारात्मक बनाते हैं इससे आपका आभामंडल सशक्त होकर फैल जाता है जिससे सभी नकारात्मक ऊर्जायें अपने आप आपसे दूर रहती है। आपके अचेतन मन बनाता है आपका भाग्य - हम अपने जीवन के आस-पास वैसी ही परिस्थितियाँ, वैसे ही लोग, समृद्धि, गरीबी, सुख-दुख, सफलतायें-असफलतायें आकर्षित करतेहैं। जितनी गहराई से हमारे अपने और दूसरों के विचारों की छाप हमारे अंतर मन पर पड़ती है। जो विचार हम भाव आधारित विश्वास या भय के साथ बार-बार दोहराते हैं वही मंत्र की शक्ति हम निर्मित कर वैसी ही तरंगे हमारे आभामंडल में चुंबकीय ऊर्जा की परतों के रूप में निर्मित करते हैं और अपने आप प्रकृति के नियमों के अनुसार उस समान ऊर्जा को अपने जीवन में आकर्षित कर लेते हैं। इस संसार में आपको कोई लेता-देता नहीं है। आप ही आकर्षित करते हैं हर पल सौभाग्य या दुर्भाग्य। हमनें बदला है अपना भाग्य तो आप क्यों नहीं ? - बचपन से ही यह बात हमेशा मेरे दिमाग को परेशान करती रही है कि क्यों कोई हमारे या दूसरों के भाग्य के साथअजीबो-गरीब खिलवाड़ करते हैं ? कौन है ये निर्णायक ? इसकी खोज ने ही आज मुझे इस सत्य तक पहुँचाया है। जब तक मैं अंजान था, अज्ञानी था, मैं भी ओरों की तरह अपने भाग्य को कोसता था और अपनी हर असफलता का ठीकरा भाग्य के सिर पर फोड ता था। प्रकृति के नियम, अचेतन मन के खेल, सूक्ष्म तरंगो के विज्ञान को गहराई से समझने के बाद अपने भाग्य की डोर अपने हाथों में ले ली और वैसे ही जीवन बनाया जैसा जीवन मैं चाहता था। १. अपना मार्ग स्वयं चुना - मेरे पिता चाहते थे मैं पंडित बनूँ और पूजा-पाठ ज्योतिष का धंधा करूँ - परंतु मेरी इसमें रूचि नहीं थी। मैंनें विरोध और विद्रोह के द्वारा वो मार्ग चुना जो मेरी आत्मा के स्वभाव के अनुकूल था। इसी विरोध और विद्रोह के कारण आज मैं ३० साल से अपने स्वभाव में जीकर हर पल आनंदित हूँ। हर व्यक्ति को अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेना चाहिये।मैंनें दूसरों की धारणाओं को, विचारों को, सुझावों को आदर दिया लेकिन जरा सा भी महत्व नहीं दिया हमेशा अपनी आत्मा की आवाज को सुना। अपने स्वभाव को महत्व दिया। दूसरों को या माता-पिता को खुश करने के लिये मैंनें अपने स्वभाव गुण धर्म की हत्या नहीं की।

२. अपना जीवन साथी स्वयं चुना-सचमुच में ईश्वर को मानने वाला व्यक्ति जात-पात और ऊँच-नीच में ज़रा भी यकीन नहीं करेगा। मैंनें भी नहीं किया। मैंने जीवन साथी वो ही चुना जो मेरे जीवन, विचारों, कार्यों के अनुकूल था। इसलिये आज मेरा दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी है। इसका मतलब स्वार्थी हो जाना नहीं है इसका अर्थ है कि अपने जीवन की बेहतरी का निर्णय आपसे बढ कर और कोई नहीं ले सकता। तुम्हें अपने जीवन का मालिक बनना चाहिये। दूसरों से आपका जीवन कभी संचालित नहीं होना चाहिये।

३. सफलता के लिये विशेषज्ञता हासिल की - समृद्धि पर सबका एक-सा हक है। समृद्ध होना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। गरीबी सबसे बड़े और अव्वल दर्जे का पाप है। समृद्धि के अचूक नियम होते हैं। इसी अवधारणा के साथ समृद्धि पाने के लिये मैंने अपने अंदर एक विशेष ज्ञान-कला की पूरी महारत हासिल की। अपने क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ बना। हर क्षेत्र में हम एक अच्छे विशेषज्ञ की खोज कर रहे होते हैं। हर व्यक्ति अच्छा वकील, अच्छा डॉक्टर ऐसा ही हुआ लोगों ने हमें खोज लिया। हम भी पूरी ईमानदारी, मेहनत, सद्‌भाव, क्वालिटी के साथ उनकी खोज को सार्थक कर रहे हैं। यही सफलता का राज है, यही भाग्य का नियम है।

४. जीवन से बीमारी शब्द समाप्त कर दिया - प्रकृति के नियमों से जब तक हम अंजान थे, बीमार पड़ते रहे। आज उनके अटूट नियमों के अपनाने के बाद ३० सालों से हमारे परिवार में बीमारी नामक शब्द ही नहीं है। न मुझको, न मेरी पत्नी डा. सविता को न मेरे बच्चे आनंद और तृप्ति को। क्या ये हमारा भाग्य ईश्वर ने लिखा या हमनें अपने आप बनाया। क्या सारे शनि-मंगल नवग्रहों के प्रभाव हमारे लिये बेकार नहीं हो गये। हम आज जीवन में वो ही आकर्षित कर रहे हैं जो हम चाहते हैं।

५. सशक्त पारिवारिक प्रेम-जीवन के सत्य और प्रकृति के नियम जान लेने के बाद आज हमारे अपने दांपत्य जीवन में अपने बच्चों के साथ, अपने स्टाफ के साथ शत-प्रतिशत सौहार्दता है, प्रेम है, आदर है क्योंकि हम हर व्यक्तित्व का पूरा सन्मान करते हैं, हरेक में आहार, विचार आदतें, पसंद, नापसंद का आदर करते हैं तो फिर विरोध कहाँ, असांमजस्यता कहाँ। कैसे पलट गया हमारा भाग्य अपने संबंधों के मामले में ? यह संभव हुआ हमारी जागृति के द्वारा। आत्म जागृति ही सूत्र है भाग्य पलटने का।

६. अचेतन मन को अपने हाथ में लिया - जब तक हमें अचेतन मन की असीम शक्तियों के बारे में परिचय नहीं था हम अंजाने में अपने जीवन में कई गलत, कई सही व्यक्ति, परिस्थितियों को आकर्षित करते रहते थे। जबसे इसकी असीम अद्‌भुत क्षमताओं को जाना तब से हम जो चाहें, जैसा चाहें वैसी परिस्थिति, वैसे व्यक्ति को हमारे जीवन में आकर्षित कर रहे हैं क्योंकि यह तरंगों का विज्ञान है। इसको न जानने के कारण हम सब भाग्य पर छोड़ देते थे। आज हमारे लाखों विद्यार्थी स्वयं अपने भाग्य विधाता है क्योंकि भाग्य कुदरत के नियमों का प्रतिफल है, ईश्वर का हस्तक्षेप नहीं।

७. आत्मजागरण से भाग्य पर शासन - जब से हमारी आँखें खुली हमनें सारी प्रतिक्रियायें समाप्त कर दी, नियमों के साथ बहने लगे। हमारे लिये सुख-दुख, रोग-निरोग, मान-सम्मान, लाभ-हानि, जैसे शब्द समाप्त हो गये। जब प्रतिक्रियायें ही नहीं तो भाग्य बनेगा कैसे। हमने ये सत्य जान लिया कि वर्तमान काबीज ही भविष्य बनता है तो हमने वर्तमान में चिढ़ने के, क्रोधित होने के, शिकायत करते रहने के, मूड खराब करने के, लोगों को तौलते रहने के, अपेक्षाओं में रहने के बीज ही नष्ट कर दिये और अब सालों से डाले जा रहे हैं हर पल कृतज्ञता के बीज, प्रार्थना के बीज, पूजा के बीज, उत्सवपूर्ण जीवन के बीज, तो हमारा भविष्य ठीक वैसा ही बनता जा रहा है। वो ही रोज सामने आ रहा है। हम भी रोज वो ही बीज डाले जा रहे हैं इसलिये भविष्यमें संसार की कोई ताकत हमें दुःखी नहीं कर सकती। हमें दुर्भाग्य नहीं दे सकती क्योंकि यह प्रकृति का अटूट नियम है जिसका जागकर उपयोग करने से हमें लाभ निश्चित मिलेगा ही। अगर आप हर पल चिढ़ते-कुढ ते, शिकायत, क्रोधा करते रहेंगे तो संसार की कोई ताकत आपको भविष्य में नारकीय दुर्भाग्यपूर्ण जीवन से नहीं रोक सकती है। प्रकृति के नियम शाश्वत है, अटूट है, अपरिवर्तनीय है - यही भाग्य के नियम है। रेकी और अचेतन मन बदल सकते हैं आपका भाग्य जैसा आप चाहें - रेकी यानि सूक्ष्म तरंगो का विज्ञान - प्रकृति के अदृश्य रहस्यों का विज्ञान एक ऐसा प्रकाश जो हर अंधेरे को नष्ट कर सकता है। रेकी एक सकारात्मक ऊर्जा है जो प्रकृति के नियमों अनुसार हो रही जो हर नकारात्मक ऊर्जा के विरोध में खड़ी की जा सकती है। अगर आपके जीवन में कुछ भी नकारात्मक घट रहा है तो आप ठीक उसके विपरीत रेकी द्वारा एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा की दीवार खड ी कर सकते हैं। नकारात्मक ऊर्जा के फोर्स को पूरी तरह ध्वस्त कर सकते हैं या नहीं तो कमजोर कर सकते हैं या नहीं तो कम से कम रोक सकते हैं।

परिवर्तन ला सकते हैं रेकी का अर्थ है कि जो विशेष ऊर्जा की आपके जीवन में कमी है उस ऊर्जा को बना देना, उस ऊर्जा को अपने जीवन में पैदा कर देना। इस तरह हम अपने जीवन में एक नयी ऊर्जा का निर्माण कर सकते हैं। हमारा अचेतन मन, हमारे विचार, भाव, विश्वास धारणाओं के आधार पर हमारे जीवन को कमजोर, दुःखी या अत्यंत शक्तिशाली, असंभव कार्य करने योग्य बना सकता है। आज हम अपने अचेतन मन के प्रतिफल है। आप जैसी प्रोग्रामिंग जाने अंजाने करते हैं आप वैसे ही बन जाते हैं और अपने जीवन में आकर्षित कर लेते हैं। अचेतन मन के विज्ञान की गहराईयों को नियमों को समझकर हम जैसा चाहें स्वभाव आदतें, शक्तियाँ, परिस्थितियां अपने भीतर पैदा कर सकते हैं। वर्तमान भाग्य के विपरीत जाकर जैसा भाग्य हम चाहते हैं उसका निर्माण कर सकते हैं। क्या ग्रह शांत होते हैं - एक सफेद झूठ - पंडित-ज्योतिष, साधु-महात्माओं जैसे लोगों के इस कथन पर हंसी आती है कि नवग्रहों को शांत किया जा सकता है। जैसे नवग्रहों को गुस्सा आता हैजैसे वह कोई व्यक्ति है जो आपके मनाने से और टोने-टोटके से खुश होकर शांत हो जायेगा। नवग्रहों की शांति के नाम पर पंडितों और ज्योतिषियों ने खूब समाज को लूटा, भयभीत किया और आज तक यह जारी है। जैसे कि पंडित ज्योतिष नवग्रहों के एजेंट है, वे इनके दोस्त हैं, जैसा वे चाहें ये ग्रह उनकी बात मानते हैं। जिस तरह सरकारी दफ्‌तरों में जितनी ज्यादा रिश्वत दी जाती है उनका काम उतनी ही शीघ्रता से निपटता है उसी तरह अच्छी रकम पंडितों पे लुटाने पर शनि-मंगल भी शीघ्र शांत हो जाते हैं। ग्रहों की लगाम पंडितों के हाथ में होती है ये जैसा चाहें उन्हें नचा सकते हैं। कब तक उलझे रहोगे ऐसे बचकाने भ्रम में ? कैसे घटता है ये सब कुछ - आईये जानें! नवग्रह न तो प्रसन्न होते हैं न शांत होते हैं ये सिर्फ हमारी अपनीफालतू की सोच है। हां जब आप पर कोई कष्ट आया हुआ होता है, आप जब परेशान होते हैं तब कोई पंडित आपसे ग्रह शांत करने के लिये पैसे लेता है तो आप सबसे पहले थोड़े निर्भय और आश्वस्त होते हैं कि चलो कोई रास्ता तो हैं इससे आपके आभामंडल में निर्भयता एवं आशा की किरण के कारण विकास होता है, आप शिथिल हो जाते हैं। आप मंदिर जाने लग जाते हैं, पूजा-पाठ, जप, प्रार्थनायें करने लग जाते हैं, दान-पुण्य, यज्ञ करने लग जातेहैं। कुछ न कुछ टोटके करने लग जाते हैं। मन्नत मांगते हैं, व्रत लेते हैंइन सारे पॉजिटिव कार्यों से आपको जो शांति, रिलैक्सेशन, निर्भयता आशा की किरण मिलती है उससे हमारा आभामंडल विकसित होकर हर नकारात्मक ऊर्जा का प्रतिरोध करता है, हमारे अचेतन मन को यही प्रोग्रामिंग होने लगती है कि अब आपका काम जरूर होगा। अब कष्ट टल जायेगा - तो मूल शक्ति के स्रोत तो आप हैं आप जितने आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं, भयों से मुक्त होते हैं, परमात्मा में अटूट श्रद्धा रखते है, कृतज्ञता, प्रार्थना पूर्वक जी रहे होते हैं। दान, दया, धर्म जैसे सकारात्मक काम करते हैं तो अपने आप सारे शनि-मंगल जैसे नवग्रहों के प्रभाव आप से दूर रहते हैं।

(Dr. Savita Sharma)

 

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